Wednesday, January 28, 2009


टुकड़े टुकड़े जोड़ कर ख़ुद को देखने का आईना बनया.

   दुनिया की भीड़ मैं अकेला न हो जाऊ,ख़ुद के लिए दोस्त बनाया.

इसे चाहे कहना मेरा पागलपन पर ये हकीकत है.
इस भीड़ मैं ख़ुद को पहचाने का ये तरीका है.

यहाँ चेहरे लगा के सब घुमते है,छुपा के आपनी हकीकत.
सभ्यता इनकी ओट होती है,मन में इनके खोट होती है.

ख़ुद की परझाई को मैंने आइने मैं कैद कर लिया.
अनजान दुनिया में ख़ुद के लिए दोस्त बना लिया .
देख मेरे हिंद को क्या हुआ,ये इतना कैसे लाचार हुआ.|
बार बार अत्तंक से क्या इसको घाव न हुआ,समझो इसकी पीड़ा.||
ये मूक है कुछ नही बोल पाएगा,हिंद अब आपनी व्यथा नही सुना पाए गा.|||

जाती धर्म सम्प्रदाय भारत के ये भी है लाचारी.|
आतंकवाद सिरहाने बैठा जाने अब किसकी बारी.||

सभ्यता की जहा खोज हुई,आज वही सभ्यता को भूल रहा.|
पछिम की चमक से देखो कही हिंद खो रहा.