Saturday, April 12, 2014

आओ मिल कर हम अपनी मौत का जश्न मनाये.

आओ मिल कर हम अपनी मौत का जश्न  मनाये.
कुछ तुम मुस्कुराओ कुछ हम मुस्कुराये.

अब नहीं रहा कोई बंधन
न कोई रिश्ता बांध बायेगा.
हम मिल चुके है मिट्टी में,
अब हमें कोई गम नहीं सतायेगा.

न तू अब किसी के प्रति जवाबदेह,
न मैं किसी के प्रति जवाबदेह.
अब नहीं रहा कोई शरीर का बंधन,
तू भी मुक्त मैं भी मुक्त.

मौत नई है जश्न भी होगा,
अब यहाँ कोई रोने वाला न होगा.
तू थी मैं था या मैं था तू थी,
अब यहाँ कोई पूछने वाला न होगा.

आओ मिल कर हम अपनी मौत का जश्न  मनाये.
कुछ तुम मुस्कुराओ कुछ हम मुस्कुराये.

Wednesday, April 9, 2014

कल और आज में बस पूरक यही.

आप सभी से अनुरोध है इसको ऐसे पड़े नारी हो तो नर के लिए नर हो तो नारी के लिए इसको महसूस करे.
कल और आज में बस पूरक यही.
कल तू थी और आज मैं हूँ.
खुश तू भी नहीं खुश मैं भी नहीं.
तू अंगे बढ़ी मैं वही खड़ा रहा.
तूने देखि दुनिया नई,
मैं अपनी दुनिया में खोया रहा.
भटक कर ही तो मैं तेरे पास आया था.
और तू नई थी तो भटकती रही.
मिला जो तुझे रस्ते में,
उसने तुझको और तूने उसको प्यार दिया.
अंगे तू इतना बढ़ी अब पीछे नहीं आ पा रही है.
बनाये थे जो तूने नए रिश्ते उनसे निकल नहीं पा रही है.
हैरान मैं नहीं परेशान मैं नहीं,
तू भी दुनिया के ले ले मज़े.
मैं खड़ा आज भी वही मैं खड़ा आज भी वही.
पर अब मैं तुझे अपना नहीं पाउगा,
अपने हदय को इतना विशाल नहीं कर पाउगा.
ये मेरा दिल है कोई कुरा करकट नहीं,
जो तेरे दमन में लगे दाग को छुपा पाउगा.
ये दुनिया है मेरे दोस्त
अब तो जीना पड़ेगा.
हैरान न हो परेशान न हो,
सब को एक दिन ये दिन देखना पड़ेगा.
अब मैं जहा खड़ा था वह से वापस जा रहा हूँ.
करने के लिए बहुत काम है,
अब बस यही मैं अपने शब्दों को अल्प विराम दे रहा हूँ.
पसंद आये तो मनन करना,
नहीं तो अंगे बढ़ना.
सभी अधिकार लेखक के पास सुरक्षित..

किस पर भरोषा किया जाये

किस पर भरोषा किया जाये,जो दिखता है.
या जो आप के पीछे होता है,
पर दिखाई नहीं देता है.

कुर्बान थे हम उसकी मुहब्बत पर,
पर अनजान थे उसकी साजिश से.
परदे के पीछे एक खेल,सजा रखा था.
मेरे अलावा किसी और से भी,
उसने अपना रिश्ता बना रखा है.

क्या खेल है जिन्दगी
साजिशो का एक पूरा जाल बुना रखा है.


मुहब्बत के नाम पर कभी, वो मेरी परीक्षा लिया करती थी.
बदल बदल के वो रूप मुझ आकर्षित करती थी.
एक दिन हमने भी बदला अपना रूप,
और यही खेल उसके साथ खेल बैठे.

जब मालूम पढ़ा उसका सच,
होश हमारे भी उड़ गए.
दिल में छुपा था कुछ और उसके,
और हम उससे मुहब्बत कर बैठे..

होती खडग अगर हमारे हाथो में,
अपना ही सर उड़ा देते.
इस सच को दबा के अपने दिल में,
यु न ही जिए  होते.

Tuesday, April 8, 2014

वो थप्पड़ मार मार कर,
अपनी औकात दिखा रहे है.
हम चुप है गाँधी के लिए,
नहीं तो भगत सिंह हमको कब से बुला रहे है.

सोये नहीं है हमारे अरमा,
दिल में शोले धधक रहे है.
थप्पड़ मरना हमें भी आता है,
लोकतंत्र की रक्षा के लिए हम
अपमान का ये जहर भी पी रहे है.

 हम आये है यह देश बदलने के लिए,
थप्पड़ भी खायेगे,ये गाँधी का देश है गोली भी खायेगे.
तुम थप्पड़ पे थप्पड़ मरो.
हम सिर्फ मुस्कयेगे.
तुम्हारे भविष्य को उज्वल
करने के लिए अपमान के
ये कड़वा घूट भी पि जायेगे.

चंद्रमणि मिश्रा

लत लगा कर तू

लत लगा कर तू
लात मार गई.
दिल के अरमानो को,
ऐसे कुचल गई.


कौन करेगा मुहब्बत लात खाने के लिए.
कांग्रेस की महगाई ही, काफी थी मरजाने के लिए.

क्यों तड़पता छोड़ गई,
कांग्रेस ही काफी थी दर्द तेने के लिए,
जो तू इतना दर्द दे गई.

की मोदी के राज्य में तू मुझे, और सतायेगी.
फील गुड फैक्टर तो देख लिया,
अब क्या मुझे गुड गवर्नेंस दिखाएगी.

अरे सब भ्रम है
जैसे तेरा प्यार था.
क्या कांग्रेस क्या बीजेपी,
सब का बाप एक था.

एक आप का ही सहारा है,
जाने कब आओगी.
सह लिया बहुत दर्द.
अब बोलो कब सरकार बनोगी.

चंद्रमणि मिश्रा

किसी की एक मुस्कराहट पर हम मर बैठे।

किसी की एक मुस्कराहट पर हम मर बैठे। 
किसी अनजाने को दिल दे बैठ,
प्यार के समुंदर में खुद को डूबा बैठे.|

कुछ पल की थी मुलाकात
हम अपने जज्बात लूटा बैठे.
तोफा खुदा का समझ उसको.
दिल के मन मंदिर में बिठा बैठे.||
उसके भोलेपन उसकी मासूमियत पे मर बैठे.
एक दिल ही था अपना उसको लूटा बैठ|||
कल तक उसको ख्यालो में जिया करते थे।
आज उसको अपना बना बैठे.
अब चुप हम है अब चुप हो है।
एक आग हम सीने में हम जला बैठे।।||
जाने कब मुलकात हो उससे,
यादो में उसके खुद को भूला बैठे.||
copyright@चंद्रमणि मिश्रा

उम्र भर का रिश्ता उसको निभाना था.

उम्र भर का रिश्ता उसको निभाना था.
पर वो अपने रिश्तो में ही सिमट गई.
आज कल उसको भी पलटने की,
राजनीतिक हवा लग गई.
चंद्रमणि मिश्र

बहुत गहरा है रिश्ता उसका मुझसे.

बहुत गहरा है रिश्ता उसका मुझसे.
यह वह मुझसे कहती है.
पर वक़्त नहीं है अब उसके पास.
वह उलझनों में इतनी उलझी है.
रिस्तो की गहराई इतनी है की महीनो बीत जाते है.
तब जा कर बात किसी एक दिन कुछ पल
की हो पाती है.
क्या करे इस रिश्ते में गहराई इतनी है की,
रोज मुलाकात हो ही नहीं पाती है.
मुलाकात की तो हम भूल गए,
उसके रिश्ते की गहराई में ऐसे खो गए.
अब वो कहा रहती है कब मिलती है.
यारो हम कब के भूल गए.
खुदा ने दे किसी को रिश्ते में इतनी गहराई.
प्यार करने की ये सजा जो हमने पाई.
चंद्रमणिमिश्रा

आज रात तनहा हो गई .

आज रात तनहा हो गई .
श्याम रंग में वो रंग गई.
गीत विरह के गा कर,
वो पगली सी हो गई.
आज रात तनहा हो गई.
श्याम रंग में वो रंग गई.
चाँद की चांदनी छोड़ दी.
तारो को भी भूल गई..
श्याम रंग में वो रंगी.
की पगली वो तो आज
सोना ही भूल गई.
आज रात तनहा हो गई.
श्याम रंग में वो रंग गई.
सूरज भी आज नहीं निकला
ऐसी एक बात हो गई.
आज रात ऐसी बीती.
चाँद की चाँद भी खामोश हो गई.
आज रात तनहा हो गई.
श्याम रंग में वो रंग गई.
चंद्रमणि मिश्रा

क्या तेरे दिल में मैं हूँ नहीं.

क्या तेरे दिल में मैं हूँ नहीं.
ए मेरे खुदा बता दे जरा.
क्या तेरे रहमत में,
मैं हूँ या नहीं.
क्यों तोडा तूने घर मेरा,
क्या प्यार तेरा मैं हूँ नहीं.
क्या अश्को में मेरे दर्द नहीं.
जो तुझेको कोई फर्क नहीं.
दे दे मुझे अपनी रहमत,
प्यार मेरा दे दे.
मेरा साथी मेरा आंगन.
मेरा यार मुझे दे दे.
चंद्रमणि मिश्रा@all copy right reserved

एक हसीन मुस्कान पे तेरी..............

एक हसीन मुस्कान पे तेरी..............
ना तू कोई गुलबदन,
न तू कोई बहार है.
फिर भी न जाने दिल को,
क्यों तेरा इंतजार है.
एक हंसी मुस्कान पे तेरे,
दिल मेरा कुर्बान है.
रे पगली तू मेरे,
हाल ए दिल से अंजन है.
एक हंसी मुस्कान पे तेरी|--------1
दिल मेरा कुर्बान प्रिये||
रूप तेरा मनमोहक,
आंखे तेरी पहचान है.
हुई है जब से मुलाकात मेरी.
अब नहीं मेरी कोई पचान है.
एक हंसी मुस्कान पे तेरी|--------2
दिल मेरा कुर्बान प्रिये||
जीते थे कल तक तस्वीर से तेरे,
एक दिन बात हुई तो खुल गई किस्मत मेरी.
कुछ तू मुझको जानी,
कुछ मैं तुझको जाना.
ऐसे हुई पहचान मेरी तेरी....
कह दिया सब हाल दिल का तुझसे,
हुआ नहीं इंतजार मुझको.
सुन कर सब बातो को,
हो गई तू बेहाल प्रिये.
न कोई पूछे मेरे दिल का हाल प्रिये..
एक हंसी मुस्कान पे तेरी|------3
दिल मेरा कुर्बान प्रिये||
चंद्रमणि मिश्रा @all copy right reserved

मुल्क एक पर मिलकियत अलग अलग

मुल्क एक है,
पर मिलकियत अलग अलग.
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम,
भारतीय कोई नहीं यहाँ.
किसी को राम किसी को अल्लाह प्यारा है.
बनते है यहाँ मंदिर माजिद रोज़,
और गरीब के घर अँधियारा है.
कैसे है लोग यहाँ के बेजान,
करोड़ों का दान यहाँ करते है.
और अपने घर के बहार खड़े गरीब को,
रस्ते चलता करते है.
चंद्रमणि मिश्रा@all right reserved

क्या नए दल से व्यवस्था बदल जाएगी

हालत ख़राब है इस मुल्क के,
और रोज एक नये दल बन रहे  है.
व्यवस्था बदलने की जब बात आती है,
तो  समझोतों पे  समझोते हो रहे है.

क्या चुनाव जीतने से
 राजनितिक दल बनाने से, सब हल हो जायेगा.
तुम कोई खुदा नहीं जो सब,कुछ बदल जायेगा.

दुर्भाग्य है मेरे भारत का की
आन्दोलनों का दौर भी सिमट गया.
अपने लाभ और आकांक्षाओ के लिए,
वो भी एक दल बना गए.

हो रहा है भारत बदलाब
मिट रहा है भ्रष्टाचार
इसी हवा में वो
कुर्सी का मज़ा ले गए.

धधकते मुद्दों को,
बस एक जिनगरी दे गए.
रोता बिलाकता बेसहारा
 हमें  छोड़ गए उसी राह छोड़ गए.


चंद्रमणि मिश्रा