Saturday, October 11, 2008

क्या ये है सही.

रत्न जड़ित श्रंगार सही,ज्ञान सही बैराग्य सहित।
लोक सही परलोक सहित,सब जन सही सब सहित।
द्वेष सही प्रेम सहित,पाप सही पुण्य सहित।
धर्मं सही देश सहित,अडम्बर सही पाखंड सहित।
अयोध्या सही राम सहित,अजमेर सही दरगाह सहित।
पीर सही पैगम्बर सहित,ईशा सही ईश सहित।
राम सही अनुराग सहित,ज्ञान सही अज्ञान सहित।
सब सही सब सहित,ये है सब सही सब सहित।
कृष्ण सही ब्रज सहित,गुरु सही गुरुवाणी सहित।
धर्मं सही अधर्म सहित,सब सही सब सहित।
दिन सही रात सहित,प्रकाश सही सूर्य सहित।
अंत सही प्रारम्भ सहित,नाश सही विनाश सहित।
सब सही अंत सहित,म्रत्यु सही जीवन सहित।
सब सही यहाँ सब सहित,फिर भी देश बाटे क्या ये है सही।
क्या ये है सही.

Friday, October 10, 2008

ऑरकुट में आकार हम सब भूल जाते है.

ऑरकुट में आकार हम सब भूल जाते है.
दिल में छुपे जख्मो को स्क्रैप बनाते है.
ऑरकुट की है अजब माया.
यहाँ पर मिलता है रश सारा.
जो ऑरकुट की सरन में आ जाये.
जीवन सफल बना ले वो आपना.
पुराने मित्रो से मिलकर,पुरानी यादे मिल जाये गी.
खोइ हुई मुहब्बत की यहाँ कोई खबर मिल जाये गी.
जीवन में जो तू कुछ पाएगा.
ऑरकुट की कृपा से वो सब दुगना हो जाये गा.
हो गई जिस पर ऑरकुट की कृपा,उसको सब मिलजाएगा.
ऑरकुट की कृपा से जीवन सफल हो जाये गा. 

Mera Maan

कितनी है मेरी जिंदगी कितने है मेरे अरमान.
सब कुछ खो गया मैं फिर भी मैं रहा अनजान.
खामोशी इतनी थी जिंदगी मैं की कुछ आहट न हुई.
जब आंख खोली तो अहसाश हुआ,कुछ हुआ.
खामोशी थी इतनी गहरी,की अहसाश को भी दबा दिया.
जिंदगी जीनी थी मुझको ये भी भुला दिया.


तेरा हंसी चेहरा तेरी कातिल निगाहे मुझे बेचेन कर देती है.
मेरी रातो के हंसी सपनो को मुझे से ही दूर कर देती है.
मेरी मुहब्बत की कही ये सूरत तो नहीं.
जो खुद मैं खुद मुझे तेरे पास कर देती है.


अब तो मेरी दिल की धड़कने तू चुराने लगी है.
एक नये रिश्ते की शुरुआत होने लगी है.
ये कशमकश भरी जिन्दी मुझे भाने लगी है.
मेरे जिंदगी मैं भी मुहब्बत की बहार आने लगी है.
मेरे जिंदगी मैं भी मुहब्बत की बहार आने लगी है.

मुझे मय का प्याला पिला दे,भक्ति रस की अलख मन मे जगा दे.

मुझे मय का प्याला पिला दे,भक्ति रस की अलख मन मे जगा दे.
मुझे भक्ति रूपी मय का प्याला पिला दे.
हे जगत के पालनहार सुन ले मेरी पुकार.
भक्ति रूपी मय पिला दे. 
भक्ति रूपी मय से में मतबल हो जाऊ.
जग को भूल कर तेरे श्री चरणों में आजाऊ.
जग को भूल कर तेरे श्री चरणों में आजाऊ. 
श्री कृष्णचन्द्र भगवन को समर्पित.

मै बदल गया जामने के साथ भूल गया रीती रिवाज़.


खुद से दूर मैं होता गया,नीरष जीवन जीता रहा.
संस्कारों की बलि दे कर उचाइयो को झुता गया.
शीर्ष पर जब बैठा मैं खुद की उचाई को नापा मैंने.
संस्कार बिहीन मैं जीवन पाया,संस्कारों की बलि दे कर मैं यहाँ तक आया.
अश्रु धारयो से तब मैंने खुद को नहलाया.
संस्कार बिहीन जीवन जी कर मैंने क्या पाया.
pahuch शीर्ष पर मैंने ने खुद की नीचे hee पाया.
संस्कार बिहीन जीवन जी कर खुद ko नीचे hee paya.

समाज मैं नव चेतना लानी है,सुप्त पड़ी जवानी है

समाज मैं नव चेतना लानी है,सुप्त पड़ी जवानी है.
क्या हमारी यही कहानी है.....................

अगर हम नहीं जागे,तो हमर आज सो जायेगा.
कल क्या होगा,क्या यही सूरज रोज़ आयेगा.
जवानी दीवानी है सुनी ये कहानी है.
सुप्त पड़ी जवानी फी से जगानी है.
सुप्त पड़ी जवानी फी से जगानी है.

हम जुड़े सब जुड़े,जुड़े एक जनाधार.
ऐसे बिखरे है हम,जैसे बिन मोती के हार.


निश्चय करे हम अब,हमको क्या करना है.
समाज के साथ मैं,या संजाज से अलग रहना है.
हो कुछ भी हम नहीं बद्लेगे, समाज क्या है नहीं समझेगे.
समाज क्या है नहीं समझेगे.


खून मैं अब उबाल नहीं धीरज का यहाँ काम नहीं.
देश मिटे,समाज मिटे या मिटे संसार.
हमको इन सबसे क्या पड़ी,ये है सब जीवन जंजाल.
ये है सब जीवन जंजाल.

कहो कृष्ण कब आओगे,पूछते है गोकुलवासी.

कहो कृष्ण कब आओगे,पूछते है गोकुलवासी.
मधुर-मिलन की आस लगा बैठे है,गोकुलवासी.
नित्य-नित्य रह तकते है अब.
कब आओगे मधुरावासी.
करून-स्वर रुन्दित गला,सिर्फ हाड़ मॉस का शरीर बचा.
कृष्ण तुम्हारी बिरह मैं सारा ब्रज जला.
कृष्ण तुम्हारी बिरह मैं सारा ब्रज जला.


राधा रानी की क्या सुनाऊ कहानी.
मीरा भी है तुम्हारी दीवानी.
प्रेम बसा के मन में,तुम खुद दूर चले गए.
प्रेम-विरह में जलती राधा छोड़ गए.
मधुरा जा कर कृष्ण तुम ब्रज भूल गए.
मधुरा जा कर कृष्ण तुम ब्रज भूल गए.


अविरति चालत रह भी मुद जाती है.
कृष्ण तेरी विरह में गोपिया पाषाण नज़र आती है.
कृष्ण तेरी विरह में गोपिया पाषाण नज़र आती है.
लोक-लाज सब भूल गई, कृष्ण विरह की आग में.
गोपिया ही कृष्ण हो गई,कृष्ण तेरी याद में.
गोपिया ही कृष्ण हो गई,कृष्ण तेरी याद में.

निज-हित्य त्याग देता है सूर्य,लेता नहीं प्रकाश का मोल.

निज-हित्य त्याग देता है सूर्य,लेता नहीं प्रकाश का मोल.
जीवन जीते है हम सभी.कभी सोचा नहीं इस ओर.
बर्षा बिन स्वरत होती,नदिया बिन जल निर्झर होती.
प्रेम बिना जीवन नीराश.जैसे बिन पानी मीन.

निज स्वरत पुष्प महक बिखेरता,नहीं लेता मोल.
सुप्त मनुष्य क्या समझे,क्या है क्षेम.

रात चौग्ड़ी दिन की खडिया हम गिनते रह जाते है.
बिन स्वरात हम क्या एक पल भी जी पाते.

सोच नहीं सोच कर जीते,नश्वर जीवन ढोते.
राग,दोष,दंभ,पाखंड का चोल ओढे.
हम निस दिन जीते है.
राग,दोष,दंभ,पाखंड का चोल ओढे.

MERI KALPANYE

HIIIIIIIIII,THIS IS CHANDRAMANI MISHRA