Friday, October 10, 2008

निज-हित्य त्याग देता है सूर्य,लेता नहीं प्रकाश का मोल.

निज-हित्य त्याग देता है सूर्य,लेता नहीं प्रकाश का मोल.
जीवन जीते है हम सभी.कभी सोचा नहीं इस ओर.
बर्षा बिन स्वरत होती,नदिया बिन जल निर्झर होती.
प्रेम बिना जीवन नीराश.जैसे बिन पानी मीन.

निज स्वरत पुष्प महक बिखेरता,नहीं लेता मोल.
सुप्त मनुष्य क्या समझे,क्या है क्षेम.

रात चौग्ड़ी दिन की खडिया हम गिनते रह जाते है.
बिन स्वरात हम क्या एक पल भी जी पाते.

सोच नहीं सोच कर जीते,नश्वर जीवन ढोते.
राग,दोष,दंभ,पाखंड का चोल ओढे.
हम निस दिन जीते है.
राग,दोष,दंभ,पाखंड का चोल ओढे.

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