समाज मैं नव चेतना लानी है,सुप्त पड़ी जवानी है.
क्या हमारी यही कहानी है.....................
अगर हम नहीं जागे,तो हमर आज सो जायेगा.
कल क्या होगा,क्या यही सूरज रोज़ आयेगा.
जवानी दीवानी है सुनी ये कहानी है.
सुप्त पड़ी जवानी फी से जगानी है.
सुप्त पड़ी जवानी फी से जगानी है.
हम जुड़े सब जुड़े,जुड़े एक जनाधार.
ऐसे बिखरे है हम,जैसे बिन मोती के हार.
निश्चय करे हम अब,हमको क्या करना है.
समाज के साथ मैं,या संजाज से अलग रहना है.
हो कुछ भी हम नहीं बद्लेगे, समाज क्या है नहीं समझेगे.
समाज क्या है नहीं समझेगे.
खून मैं अब उबाल नहीं धीरज का यहाँ काम नहीं.
देश मिटे,समाज मिटे या मिटे संसार.
हमको इन सबसे क्या पड़ी,ये है सब जीवन जंजाल.
ये है सब जीवन जंजाल.
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